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manoranjanthakur


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नग्न होना, दिखाना

Posted On: 6 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा में

125 Comments

मैं आहत का क्रन्दन स्वर हूं

Posted On: 18 Dec, 2011  
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जनरल डब्बा में

57 Comments

बेटी तो सेलेब्रिटी है

Posted On: 11 Dec, 2011  
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जनरल डब्बा में

58 Comments

छोटी सी उमर में लग गया रोग

Posted On: 19 Nov, 2011  
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जनरल डब्बा में

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शादी डॉट कॉम का रॉकस्टार

Posted On: 13 Nov, 2011  
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जनरल डब्बा में

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हम न जाइब दोसर घाट है छठी मइया…

Posted On: 31 Oct, 2011  
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जनरल डब्बा में

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चंडाल के पीछे रा.वन

Posted On: 26 Oct, 2011  
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जनरल डब्बा में

23 Comments

एक पर दूसरा फ्री

Posted On: 24 Oct, 2011  
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जनरल डब्बा में

25 Comments

क्योंकि वह औरत है

Posted On: 23 Sep, 2011  
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जनरल डब्बा में

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एसएमएस का मौसम

Posted On: 22 Sep, 2011  
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जनरल डब्बा में

32 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: versace bright crystal pommegranate heaven Contrenadef

के द्वारा: Christopher Stephen morona

के द्वारा: manoranjanthakur

मनोरंजन जी ! सवाल आपने बड़े ज्वलंत उठाये हैं. ज्वलंत इसलिए कि आज के दौर में खासकर हमारे देश में यह एक नयी समस्या के तौर पर खड़ी है और देखी जा रही है. वैसे नग्नता के इतिहास पर दृष्टि डालें तो हम पातें हैं कि धरती के विभिन्न हिस्सों में एक दौर ऐसा भी था जब नग्नता बतौर सामाजिक व्यवहार के रूप में मान्य थी. लगभग ५०० इ.पू. ईजिप्ट, ग्रीस, पूरब के देश और भारत में भी नग्नता का व्यापक इतिहास है. मध्ययुगीन भारत से लेकर २० वीं सदी तक परदे के पीछे इसे कुछ संपन्न लोग ही देखा करते थे और वह सब कुछ होता था जिस पर आज हम चिंतित हैं. फर्क पड़ा है २० वीं सदी के उत्तरार्ध में जब विज्ञानं एवं सुचना तकनीक के आश्चर्यजनक विकास ने अनेक गुप्त रहस्यों से पर्दा हटा दिया. और तब से हर गुजरते साल के बाद कुछ न कुछ नया हमारे सामने आता गया है. जिस तरह तमाम गतिविधियों में तेजी आयी, वैसे ही यौन व्यव्हार में भी. मेरा स्पस्ट मानना है कि नग्नता किसी भी रूप में चरित्र से जुदा मुद्दा नहीं है. अर्थतंत्र कि दिशा ही समाज, साहित्य, संस्कृति, आचरण, रस्म, रिवाज, विधि, विधान सभी कि दिशा तय करती है. जब अर्थतंत्र का मूल उद्देश्य मुनाफा बन जाता है तो जाहिर है, पैसा आना चाहिए, भरपूर आना चाहिए, हर दिशा से आना चाहिए और लगातार आना चाहिए. फिर सेक्स और नग्नता भी यदि पैसा लेन के माध्यम बन जायें तो इनके उपयोग को कैसे रोका जा सकता है. आज जो हो रहा है और जिनके बारे में हम चिंतित हैं वह इससे जुदा नहीं है. जिसे यह सब जारी रखना है वह नैसर्गिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता कि बातें करता है, बाज़ार सजाता है, दाम लगता है, माल बनाता है और परोसता है. भोली भाली लड़कियों और भोले भाले लड़कों को लुभा कर टीवी पर सजाया जाता है, उन्हें बाज़ार में बिकने लायक तैयार किया जाता है. उन बच्चों को और उनके माता-पिता को भी पैसा दिखाई देता है, यह है आज का अर्थतंत्र. लेकिन इसके सन्दर्भ में एक और बात गौर करने के लायक है. आपने वस्तुस्थिति को ज्यों-का-त्यों रख दिया है. कोई समाधान नहीं सुझाया. मेरा के सवाल है. कम्युनिस्ट शब्द को भूल जाईये, लेकिन संसार में यह कोई क्यों नहीं कर पा रहा है कि ७० साल के कम्युनिस्ट शाषण के दौरान सोविएत रूस में वेश्यावृति थी, बिकाऊ नग्नता थी, स्त्रियों को माल समझा जाता था, लोग भूख से मरते थे, बेरोजगार सडकों पर घूमते थे. यह सब कहना सिर्फ सिलिये संभव नहीं हो पा रहा है क्योंकि यह सब नहीं था. क्यूबा में आज भी नहीं है. अमेरिका में है, जापान में है, इंडोनेसिया में है, ब्रिटेन में है, भारत में है, पाकिस्तान में है. और 'गन्दा' शब्द कम्युनिस्ट हटाने के बाद से रूस में भी है. यह फर्क क्यों हुआ? दरअसल, पैसा है द्रव्यवाचक संज्ञा और आचरण एवं मर्यादा है भाववाचक संज्ञा. सुख, शांति, इज्ज़त भी भाववाचक संज्ञा ही हैं. मुश्किल यह है कि लोग भाववाचक संज्ञाओं को द्रव्यवाचक संज्ञाओं में ढूँढने लगे हैं. तो समस्या घनीभूत होगी. द्रव्यवाचक संज्ञाओं पर कौन राज कर रहा है, इस राज में किसकी भाववाचक संज्ञाएँ लुट रही हैं - सोचने का असली मुद्दा यह होना चाहिए. तथापि, मैं आपकी चितन, चिता, चैतन्य और चुभन कि क़द्र करता हूँ. यह बेलगाम संस्कृति बच्चों को संस्कारहीन बना रही है, कोई दो राय नहीं हो सकती. ऐसी ही बेलागामों पर लगाम लगी थी ७० साल तक जिसके ढीला होते ही नतीजा हमारे सामने है, जहाँ नहीं था वहां भी, जहीन पहले से था उसके बारे में क्या कहना. आपने सोचा, धन्यवाद्. आइये हम आशा करें कि ऐसी ही सोचने से कुछ करना भी आरम्भ होगा, यह सब बदलेगा.

के द्वारा: Manoj Kumar Verma

के द्वारा: manoranjanthakur

के द्वारा: manoranjanthakur

के द्वारा: manoranjanthakur

के द्वारा: manoranjanthakur

के द्वारा: manoranjanthakur

के द्वारा: tejwani girdhar

मनोरंजन जी, नग्न होना तो अब इस देश में एक महामारी की तरह फ़ैल रहा है, इसमें दोष हमारा भी है, हम कुछ कर भी नहीं सकते मसलन मैं एक बात इस पर कहना चाहूँगा, बीते साल हमारे देश को दो महान और स्वतंत्र सोच की महिला का पूर्ण रूप से दर्शन हुआ, पहली "पूनम पांडे" और दूसरी "सुन्नी लेओनी" पहली महिला वो है जो भारतीय टीम के लिए अपना कपड़ा उतारने को बेकरार है, और अपनी विडियो खुद बनाती है, और दूसरी महान महिला पोर्न फिल्म जगत की सनसनी है. हमने दोनों को ना सिर्फ स्वीकार किया बल्कि उन्हें एक प्लेटफोर्म भी दे दिया गया, ये बात मैं सिर्फ इस लिए कह रहा हूँ की आप सोच सकते है की हमारी सोच किस दिशा में जा रही है, शायद कल का सच यही हो आपकी इस "बोल्ड" कोशिश को नमन

के द्वारा: anandpravin

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के द्वारा: NeryAssunny

के द्वारा: Nikhil

के द्वारा: manoranjanthakur

के द्वारा: aditi

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के द्वारा: abhay

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के द्वारा: rajat

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के द्वारा: aditi

के द्वारा: manoranjan thakur

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के द्वारा: manoranjan thakur

आदरणीय ठाकुर जी, सादर ! आम जन के मन की बात को स्वर देनेवाली काव्य रचना के लिए बहुत बहुत बधाई ! आज इसी की आवश्यकता है. "मैं आहत का क्रन्दन स्वर हूं। सुखी जगत में-धनवानों को, सुख है मधु है-मधुर प्यार है और, गरीबों की दुनिया में, हंसता रहता दुख अपार है जो पल-पल आहें भरते हैं, उन आहों का गान अमर हूं । मैं आहत का क्रन्दन स्वर हूं। रावन बनकर अट्टहास करते हो हम सब की लाशों पर, तुम अपना अधिकार समझ बैठे हो जनता की साँसों पर, मत भूलो बूढ़े दधिची को जिसने हड्डी दान किया था, उसी अस्थि से वज्र बनाकर असुरों का संहार हुआ था ! मैं ही "पालक", मैं ही "कर्ता", मैं ही प्रलयंकर शंकर हूँ, मैं आहत का क्रन्दन स्वर हूं।" . जोश जगानेवाली कविता के लिए पुनः आभार !

के द्वारा: shashibhushan1959

के द्वारा: manoranjan thakur

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के द्वारा: ractClera

के द्वारा: Rajesh Thakur

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प्रिय मनोरंजन जी आप की ये अनोखी कला बहुत ही गजब की है व्यंग्य और हंसी ..कितना कुछ समेट देते है आप अपने लेखों में ....कभी जोरदार थप्पड़ ...सटीक वचन ...बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करते हैं ये लेख ..काश युवा पीढ़ी सुधर जाए ....राह पर आये भ्रमर ५ आप भी हमें एसएमएस कीजिए, मैं भी आपको यूं ही एसएमएस करूंगा, दोनों में प्यार का जो एसएमएस फलेगा उससे किसी का दिल नहीं टूटेगा। अरे फेसबुक पर युवाएं भटक रहे हैं। बंगलुरु में आईआईएम की छात्रा मलिनी मूर्मू ने इस कारण खुदकुशी कर ली कि ब्यॉयफ्रेंड से उसका ब्रेकअप हो गया और इस बात की सूचना उस बेवफा दोस्त ने फेसबुक पर डाल दी, दुखी प्रेमिका को यह रास नहीं आया, मर गयी।

के द्वारा: surendra shukl bhramar5

के द्वारा: manoranjanthakur

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प्रिय मनोरंजन जी करारा व्यंग्य समाज के बिगड़े हालात पर स्थिति सचमुच चिंतनीय है अद्भुत नज़ारे जैसा की सब आप ने अपने लेख में लिखा है दिखाई दे रहे समय की मांग तो ये नहीं है लेकिन हम देश को गर्त में धकेलते जा रहे भारत की संस्कृति को धता बता रहे ....सुन्दर लेख सेक्स जगाओ, नारी सौंदर्य का राज बताओ। अखबारों में छपते विज्ञापन, टीवी पर खुलापन, प्रचार के बहाने जिस्म की पैमाइश, रजामंदी के लिए साफगोई ललचाहट परोसने और ये कहने कि हर एक के लिए फ्रेंड जरूरी होता है। ये डर्टी गेम अब समाज का एक अंग, समय की मांग बन गया है। महंगाई की इस दौर में पति अगर ये सलाह दे कि महीने में डेढ़ सौ ग्राम लिपिस्टक तुम लगा जाती हो, तो पत्नियां यह कहने से गुरेज नहीं करती कि उसमें से आधा तुम चाट जाते हो।

के द्वारा: surendra shukl bhramar5

के द्वारा: Pawan Thakur

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अन्ना की  मनोरंजन जी चाटेंगे (अरे यारों आइस्क्रीम की बात कर रहा हूँ).  और अन्ना जी की जीत सुन कर मनोरंजन जी को अन्ना मिर्ची जरुर लगेगी । (कहाँ लगागी ?.... अरे भाई कुछ खुद भी सोचिये ना.) मनोरंजन जी छड़कछाप होटल मे बैरा थे शायद तभी एक साथ इतनी डिश का नाम धारा प्रवाह बोलते गये.    सरकार का दिमाग़ ठिकाने पे आ गया भले ही थोड़ी देर से नही तो अभी तो एक ही अंगद (मंजीत सिंह) लंका (संसद) मे घुसा था, फिर एक और बंदर हनुमान वहाँ जाता और लंका दहन होता, फिर भी तुम्हारी कुम्हकर्णी सरकार की नीद नही खुलती तो जो तुम्हे बानर दिखाई दे रहे हैं उनको तुम्हारा ये छड़कछाप ब्लाग  नही रोक पाता.......

के द्वारा: ajaysingh

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वाह भाई मनोरंजन जी,  आपके इस विचार को देख कर ऐसा लगा जैसे किसी मच्छर ने आप को काट लिया और आप की नींद टूट गयी ,फिर आप ब्लाग लिखने बैठ गये.  नाली के कीड़ो को भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलनकारी मच्छर ही दिखाई देते हैं तो ये कोई आश्चर्य नही है. अब तक 10 दिनों के आन्दोलन मे कितनी सार्वजनिक सम्पत्तियों को हानि पहुँचाई गयी, कहाँ ट्रेने रोकी गयीं,कितने सरकारी बसें जलायी गयी,किस नेता के घर पत्थर फेंके गये,किस नेता पर जूते फेंके गये ?????? चुनाव के समय ये नेता जी लोग लाव-लश्कर का साथ जनता के घर बार-बार आते हैं ,अगर आज पहली बार इतनी जनता एक साथ एक ही बात के लिये उनका दरवाजा खटखटा रही है तो आप बेचैन क्यों.......!   (ये मच्छर तो हवा मे उड़ रहे हैं , कुम्भकर्णी सरकार को काट कर    जगाने की कोशिश कर रही है, आप नाली में चैन से सोइये)

के द्वारा: ajaysingh

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यही तो नई पीढी की आजादी है, जिसे बढाने में तथाकथित एडवांस बुद्धिजीवियों का हाथ है। नारी स्वतंत्रता के नाम पर यही हो रहा है। आज की नारी इसे ही अपनी आजादी मान रही है।  आज की युवा पीढी यह भूल गई है कि अधिकार के साथ कुछ कर्तव्य भी होते हैं, जिनका पालन नहीं करने पर पूरी सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जायेगी। लेकिन हमारी युवा पीढी भी क्या करे। हमारे चैनल्स, हमारी फिल्में, पत्र-पत्रिकायें, अखबार सभी नंगेपन से भरे पड़े हैं। नारी को स्वतंत्रता मिलनी चाहिये, पर शिक्षा में, नौकरियों में, घर में। उसे शरीर दिखाने की स्वतंत्रता नहीं मिलनी चाहिये। यह हमारे सामाजिक व्यवस्था के  अनुकूल नहीं है। आज की महिलाओं के वस्त्र इतने बेतुके हो गये हैं कि न चहते हुए भी आदमी के मन में गलत भाव जग जाते हैं। अखबार और मिडिया में प्राय अब रेप और छेड़खानी की खबरें आने लगी हैं। सभी लोग इसके खिलाफ बोलते हैं, पर इसके मूल कारण पर कोई विचार नहीं करता, कोई अपना मुँह नहीं खोलता। चैनल वाले रेप की खबरों को रस ले-लेकर दिखाते हैं। परन्तु इस बात पर भी विचार करना चाहिये कि कोई अकेली लड़की आधी-आधी रात तक पब और रेव पार्टी में बिताये तो कोई युवा अकेले मिलने पर क्या उसकी पूजा करेगा। रात-रात भर तंग कपड़े पहनकर डिस्को में नाचे तो वह किस परिणाम की अपेक्षा करती है, और क्यों। आग के नजदीक गैस सिलिंडर रखकर सोचें कि उसमें आग न लगे. तो यह आपकी भूल ही होगी। इन सबका अन्त बहुत भयावह होता है, और परिणाम बहुल दुखद। बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों को इसपर विचार कर इसका हल खोजना चाहिये। अभी यह बामारी प्रारंभिक अवस्था में है। 

के द्वारा: Dr. SHASHIBHUSHAN

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के द्वारा: manoranjan thakur

के द्वारा: aabhay mishra

जीवन की नश्वरता में विश्वास करते हैं ये नग्न लोग,जन्म से नंगे,मृत्यु के बाद भी नंगे,जीवन के बीच में भी नंगे की पुरकश कोशिश कर मनुष्यों को जीवन के यथार्थ से परिचित कराते रहते ये पूजनीय प्रतिष्ठित हस्तियाँ मानवता के लिए अपनी लज्जा की आहुति देते आये हैं,मैं तो कहता हूँ कि इन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए,इनकी वजह से ही कई चरित्रहीनों के मन में अपार आभासिक शांति मिलती है,शाहरुख़ कि नंगे तो पहले भी दिख चुकी है,लेकिन पूनम पाण्डेय ने वादे को नहीं निभाकर करोड़ो दिलों को ठेस पहुंचाई है,कपडे उतारने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके बाद लोगों को इनका भौंडा अभिनय भी देखने कि परवाह नहीं रहती,पता नहीं यह नैतिक परचम कहाँ तक लहराएगा,आपने बहुत सही लिखा है.

के द्वारा: rahulpriyadarshi

के द्वारा: manoranjanthakur

के द्वारा: manoranjan thakur

के द्वारा: manoranjanthakur

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: ajay

सर आपकी हर लाइन बिलकुल सही है, ये वाकई सोचने वाली बात है की इतने बड़े न्यायपालिका से आम लोगों का विस्वास लगभग उठ चूका है, और जो अब भी इसके चुंगल में फसें है वो आप और मेरी तरह कमजोर लोग हैं जिनकी मजबूरी है, काले कोट के पीछे पीछे अपनी ज़िन्दगी भर की कमाई को, अपने सच को साबित करने के लिए बहा देना, सिर्फ एक सकूं की खातिर! सर जैसा की आपने कहा की न्याय अब अमीरों की रखेल (इस शब्द के यूज़ के लिए माफ़ी चाऊंगा अपने भ्रष्ट न्यायपालिका से) बन गया है, ये सब क्यों? क्यों हम सब इतने भ्रष्ट हो गए है? आखिर कोई तो वजह होगी? आज हमारे देश में शिक्षित युवाओं की कमी नहीं जो बड़े बड़े सपने लिए आँखों में सिस्टम से लड़ने की बात करते है, फिर क्यों वही लोग अफसर बनते ही सिस्टम को ही अपना ईमान बेच देते है, सिर्फ ये कह के की सिस्टिम को हम या अआप कोई अकेले नहीं बदल सकता??? और इन शब्दों के साथ ही वो सारे क्रन्तिकारी विचार हवा हो जाते है, आखिर क्यों??? आज भ्रस्ताचार इतने ज्यादा पाँव पसार चूका है की एक छोटी सी सरकारी नौकरी पाने के लिए ५-१० लाख रुपये मांगे जा रहे है! जो काबिल है वो वेदेष उड़ जाते है और जो रह जाते है वो किसी तरह पैसों का जुगाड़ कर नौकरी पाने की कोशिश करते हैं. और जो कामयाब हो जाते है वो सबसे पहले जो चीज़ सोचते हैं वो ये की. जो पैसे लुटा चुके उन्हें जल्दी से जल्दी कैसे वापस लाया जाय और वो आ जाते है इसी भ्रष्ट सिस्टम में! एक बार जो इसमें डूबें तो फिर कभी भर नहीं आ पाते, यही कमोबेश सभी की कहानी है! तो क्या ये कहानी यू ही चलती रहेगी? शायद नहीं, हमारे स्कूलों में सुरु से ही बच्चों को चरित्र निर्माण इस तरह करना चाहिए की वो मुस्किल से मुस्किल हालत में भी अपने ईमान को बचाएं रखने में कामयाब हो सके.... काश ये सब हो पाता.....

के द्वारा: Prakash Kharayat

के द्वारा: rahul misra




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