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manoranjanthakur


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ये देसी हवन कुंड

Posted On: 3 Apr, 2015  
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क्या चाहिए आपको

Posted On: 27 Feb, 2015  
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गांव की वो एक रात

Posted On: 14 Feb, 2015  
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मेरी शान-ए-फकीरी सलामत रहे

Posted On: 15 Sep, 2014  
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अधर्म की देह में समाती द्रोपदी

Posted On: 8 Sep, 2014  
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कर दो वतन के वास्ते कुरबान जिंदगी

Posted On: 25 Aug, 2014  
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शिक्षा की स्लैट में यौन, कुंठा, ब्लैकमेल

Posted On: 20 Aug, 2014  
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अंखियां करे जी हुजूरी

Posted On: 11 Aug, 2014  
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वैदिक मंत्र से हाफिज यज्ञ

Posted On: 15 Jul, 2014  
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धनखड की बरात

Posted On: 7 Jul, 2014  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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ह देश वही है जहां राम मंदिर बना नहीं, ध्वस्त बाबरी मस्जिद का ढाचा कहीं दिखा नहीं बावजूद मुजपफृपुरनगर के बहाने, कहीं गोधरा तो भागलपुर दंगे के सिरहाने मानवता एक अदद इंसान की बोली जरूर लगती, मिलती, दिखती है. सवाल फिर वही, कब जागेगा इस देश का मुसलमान! फुर्र से बिहार भाजपा को मोनाजिर हसन सरीखे झंडू बाम क्या मिल गया मुस्लिम धु्रवीकरण का अहसास जाग उठा. देश वही है. हालात भी वही. राजनेता से लेकर हुक्मरान, गांव-जवार के जनप्रतिनिधि, गली के मुखिया से आम लाचार आदमी तक पूरा जमात, कुनबा भारत का आज रसास्वादन, उसी पर आमादा है. ऐसे में खोखली अर्थव्यवस्था की दीवार को लांधना, उसे पाटना, अबकी बार ना सदाबहार के लिए बेहद नामुमिकन,असंभव. सबसे अधिक मध्यमवर्ग को पीसना है वही अब तक पिसता आया है, रहेगा. आलू, प्याज, चीनी के देश में भंडार रहते दाम बेशुमार और सरकार लाचार यही शुरू से खिस्सा भी है और साफगोई भी. देश के लोगों में धैर्य नहीं है. कल तक चुनावी सभाओं में दहाडने वाला शेर आज मौनी बाबा बन चुका है. गरीबों की सेहत मंद पडने लगी है और अमीरों की बस्ती दो लाख के निवेश पर टैक्स ्रफी का मजा उठा रही हैैं. वो ही पहले वाला रुतबा बरकरार है आपका मोरंजन जी ! कहाँ गायब हो गए इस बीच , लिखते रहिएगा !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: pkdubey pkdubey

आदरणीय मनोरंजन ठाकुर जी.आप का लेख अच्छा लगा.ये दुनिया वास्तविकता से दूर होती हुई अब सपनो की दुनिया बनती जा रही है,जहाँ पर सपने के सौदागरों की कमी नहीं है.सपना बेचने वाले या सपना दिखाने वाले तो व्यापारी हैं,जो हमेशा फायदे में ही रहतें हैं,नुकसान तो हमेशा आमजनता का ही होता है,जो इन सौदागरों से सपने खरीदती है.आप ने समूचे देश की तस्वीर पेश की है,और उन सब का जिक्र किया है जो सपने दिखा रहे हैं और आमजनता का भी आप ने जिक्र किया है,जो सपने देख रही है.आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी ने अपने कमेंट में बहुत सही कहा है कि-"नितीश, मोदी, राहुल सपने दिखाएंगे हम सपनो में ही लोट पोट हो मर जायेंगे. हम तो सैनिक हैं, बहादुर नौजवान हैं, फेसबुक पर भी बलिदान हो जायेंगे!.भीषण बयार में छोटे मोटे कीट पतंगे बह/मर जायेंगे… शहीद तो सैनिक ही होते हैं.उनके लिए तो अब बुलेट प्रूफ पोडियम बनने जा रहा है. जनता मरती है तो मरे." अच्छे लेख के लिए बधाई.

के द्वारा:

आदरणीय ठाकुर साहब, सादर अभिवादन! आजादी के लिए सात बिहारियों ने जान गँवाई और पटना के शहीद स्मारक में अपनी जगह बनाई! ६ बिहारी जो बम विष्फोट में मारे गए, मोदी के सपनो को सच करने के लिए ..जरूर जगह बनाएंगे किसी चौराहे पर जब मोदी पी एम बन जायेंगे. नितीश, मोदी, राहुल सपने दिखाएंगे हम सपनो में ही लोट पोट हो मर जायेंगे. हम तो सैनिक सैनिक हैं, बहादुर नौजवान हैं, फेसबुक पर भी बलिदान हो जायेंगे!.भीषण बयार में छोटे मोटे कीट पतंगे बह/मर जायेंगे... शहीद तो सैनिक ही होते हैं उनके लिए तो अब बुलेट प्रूफ पोडियम बनने जा रहा है. जनता मरती है तो मरे. ये दहशत गर्द मुस्लमान ही क्यों होते है और १०-१० हजार रुपये में बम रखने की हिम्मत रखने वाला आखिर बिहार का छात्र ही हो सकता है ... बड़े बेदर्द हैं ये लोग......सपने को जलाकर राख कर दो!

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नारी जो प्रकृति है। नदी है। देवी, वसुंधरा है। वात्सल्य, त्याग, करुणा व प्रेम की प्रतिमूर्ति। बिना किसी उपमा के जिसके समर्पण की कोई सीमा, बांध नहीं। परमात्मा से महात्मा, प्रभु को पाने की पहली सीढ़ी नारी आज सामाजिक व्यवस्था, काल, भूगोल, जाति, धर्म व रिश्तों के अनुरूप बदलाव की कहीं सोचती भी है तो सामाजिक बर्बरता के आगे बोलती बंद कर। मजबूरन, आज स्त्री मुक्ति का साधारणीकरण संभव नहीं। ऐसे में ही एक आवाज, जागो तुमी जागो, जागो तुमी जागो, जागो दुर्गा जागो। दशप्रहरधारिणी जागो तुमी जागो… के जयघोष के बीच महिषासुरमर्दिनी मां दुर्गा के आह्वान की अवधारणा धार्मिक मान्यता से दूर राष्ट्र की कल्याणपरक राजनीतिक शक्तियों के साथ घनिष्ठ संबंध, तारतम्य बांधता मिलता, सुकून देने को काफी। संदेश भी साफ। शक्ति पूजा विराट प्रकृति दर्शन को समेटे, नारी स्वरूप को विस्तारित, विचारित, प्रस्तावित करने को तैयार कि बहुत हुआ। आधे शब्द का प्रयोग अब नहीं। जिस कोख से पुरुष जन्मा, उसी कोख को वर्जित फल कहने का जमाना गया। इतिहास भी गवाही देने को तैयार। मैसोपोटामिया, हड़प्पा व महाभारत युगीन उन्नत व विकसित सभ्यताएं क्यों नष्ट हो गयी। कारण, प्राकृतिक प्रकोपों से बचने का कोई उपाय उन सभ्यताओं के पास नहीं बचा। एकदम सटीक ! लेकिन हम साल में एक दो दिन बच्चियों को खाना खिलाकर अपनी इतिश्री समझ लेते हैं ! बढ़िया लेख

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हिन्दी ब्लॉगिंग पर अत्यंत प्रासंगिक, मौलिक, विचारणीय और सुदृढ़ चेतना के साथ लिखा गया आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ... "ऐसे में, हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया किसी चमत्कार से आज कम नहीं। लगातार, अनवरत ब्लॉगिंग की दुनिया तेजी से बदल, करवट ले रही है। खासकर, हिंदी तबके में उसी की भाषा, परिभाषा गढ़ते, बुनते। ब्लॉगर यानी एक वैसा स्त्री-पुरुषों का जीवंत समूह जो फकीरी का रंग ही उमरिया भर ओढ़े,बिछाए मिलते हैं। ऐसा रंग जो कभी भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक, गांधी, बिरसा जैसों की चढ़ी थी। जिसे कोई सत्ता भी धो नहीं सकी। हिंदी ब्लॉगर भी उसी राग-रस में देशभक्ति का चोला धारण, वरण किए सत्ता पिपासुओं के खिलाफ शंखनाद किए मंचों पर मिल रहे। बारहों मास बिना किसी सामाजिक, राजनीतिक विद्वेष, प्रतिस्पर्धा के फकीरी रंग में ऐसे सराबोर कि दूजा रंग भी ऐसे साधकों के उद्देश्य, मंशा, समझ-सोच, प्रतिबद्धता को बदल, डिगा नहीं सकते। इस समूह का संपूर्ण जीवन ही विश्व में होने वाली घटनाओं से द्रवित हो उठने सरीखे होता है। ह्रदय पाषाण न होकर यूं मोम की शक्ल में मानो मस्तिष्क सभी बातों, विषयों, घटनाओं का सीधा असर करता, रू-ब-रू होता। पत्तों का हिलना। बकरियों का मिमियाना। चिडिय़ों का चहचहाना साधारण सी बातें भी जिसके मिजाज पर प्रभाव डालती हों वह कोई और नहीं महज दुनिया भर में भारतीय लोगों की एक जमात है जो आज हिंदी को सार्थक गति देने मजबूती से पैठ बना रही हैं।"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

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तय है, आस्था, धर्म का जितना मजाक उड़ाना हो सीख लो इस इंडिया से। प्रज्ञा ठाकुर के भी भक्त इसी देश में हैं। नित्य नयी-नयी शिष्याओं से सेक्स करने वाले स्वामी नित्यानंद को भी कभी भक्तों की कमी नहीं रही। बाबा रामदेव बाजार के सबसे बड़े उत्पादक हैं। वे बाजारवाद के हिस्सा हैं। उत्पाद के सहारे उनकी धाक है। हिंदुस्तान लीवर सरीखे उत्पादकों से भी ज्यादा प्रोडक्ट पतंजलि की दुकानों में बिक रहे हैं। दांत साफ करने से लेकर साबुन, सरसों, नारियल तेल, आटा, बेसन सब बेचते हैं बाबा। बाबा रामदेव का मतलब ही एक ब्रांड है। ऐसे भगवान खड़ा करने वालों की एक अलग दुनिया, एक अलग पहचान है जिन्हें किसी सही भगवान की जरूरत नहीं पड़ती। पैसे, ग्लैमर की एक चकाचौंध दुनिया जिसके सामने वो आंसू भी बहाते हैं। भ्रम में भी रखते, जीते हैं। सेक्स का स्वाद भी चखाते हैं। यही भ्रम तो भक्तों को सत्य साई ने भी दिखाया था। वो भविष्यवाणी जिसमें बाबा ने 96 साल तक जीने की बात कही थी लेकिन सही भगवान ने उन्हें 85 साल में ही बुलावा भेजवा दिया। जो भक्त चमत्कार की आस में बैठे थे उन्हें ऊपर वाला कोई चमत्कार देखने का मौका नहीं दिया। अब लाखों भक्तों के दान से खड़े हजारों करोड़ की संपति के स्वामी सेंट्रल ट्रस्ट की कमान जिसके हाथ है वही एक दिन नया भगवान बन खड़ा होगा। काहे को इतना तगड़ा लेख लिखे हो मनोरंजन जी ? लोग कहेंगे आपने भावनाएं आहात कर दीं ! एक एक बात से सहमत हूँ ! लेकिन ऐसे लेख लिखने के लिए दिमाग और दिल को काबू में रखना होता है क्यूंकि हर कोई किसी न किसी से दीक्षा लिए बैठा होगा ! बहुत बहुत बधाई ! बेस्ट ब्लोगेर न भी हुए होते तब भी उतनी ही बधाई देता आपको !

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मनोरंजन जी इस देश में अराजकता फैलाने के लिए कुछ भ्रष्ट दुष्ट शैतान, दुर्दांत जो न तो हिन्दू हैं, न मुसलमान और न किसी धर्म जाति से सम्बन्ध रखते हैं, नेताओं के टुकड़ों पर पलते हैं, भ्रष्ट नेताओं के आगे पीछे कुत्तों की तरह पूछ हिलाते घूमते हैं, वे ही ऐसे अकारण द्वेष फैलाते हैं, बात बात पर तूफ़ान मचाते हैं ! फिर मंत्रियों को भी फायदा होता है इस तरह अरबों की बनी फिल्म को बंद करवाने, धार्मिक उन्माद फैलाने के पीछे कोई मामूली हाथ नहीं होता, कोई बड़ा भ्रष्ट दबंग मिनिस्टर के गुर्गे होते है ! देश की अखंडता पर दाग लगाने वाले, जो हिन्दुस्तान में रहते हैं, देश का अन्न खाते हैं पर देश की अर्थ व्यवस्था की दीवारे हिलाते हैं, इन दुष्ट शैतानों को जल्दी ही समाप्त नहीं किया गया तो आने वाला हर दिन संकटमय होता जाएगा, अर्थ व्यवस्था बिगड़ती जाएगी ! एक ऐसा भी दिन आएगा जब सारी फिल्म इण्डस्ट्रीज बंद हो जाएगी !

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सब भावनाओं के खिलाडी हैं भावनाएं मनुष्य को सोचने को और उसी भावानुसार करने को मजबूर कर देती है कमजोर मानसिकता वाला ,संसकार- विहीन मनुष्य पशु ही हो जाता है यह सब कुछ प्राक्रतिक है वह सब कुछ अपने-अपने स्वभावानुसार होता रहता है लेकिन मनुष्रय एक विकसीत प्राणी हैअतः वह भावनाऔं से खेलने के नए-नए रूप निकालता रहता है क्या देवता, क्या राक्षस,क्रया स्त्री ,क्या पुरूष,कोई धर्म,कोई भी व्यक्ति हो यही आपके लेख का सारांश है  क्या लेखक ,क्या कानून,क्या धर्म,कुछ कर पाते हैं हम नैतिकता का पाठ पढाकर कुछ संस्कार जरूर दे सकते हैं लेकिन वर्तमान की भौतिकतावादी दिनचर्या सब मटियामेट कर-देती है हम गौतम बुद्रध को शांति के मसीहा की तरह याद-कर यही कह सकते हैं---- ओम.. शांति ..शांति ..शांति

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आपका लेख आदिकाल से आजतक की समयावधि के दौरान सेक्स के प्रति पशुओं से भी निम्नतर भारतीय मानसिकता को दिखाने में सर्वथा सफल रहा है. स्त्री और पुरुष, कमोवेश दोनों को ही आपने बराबर से दोषी माना है, शायद स्त्रियों को कुछ अधिक ही! ...परन्तु लोकलाज के भय से आपने समानांतर रूप से स्त्रियों को अधिक भुक्तभोगी दिखाया है, सहानुभूति भी प्रकट की है उनके प्रति! ...जाने-अनजाने यह, लोकलाज के चलते ही सही, ..परन्तु सही बात कह गए आप, यद्यपि मंशा उनको बख्शने की बिलकुल भी न थी आपकी! यही एक आम पुरुष सोच है आज! मेरा व्यक्तिगत मत है यह, शायद गलत भी लग सकता है आपको, कि स्त्रियों में नैतिकता का स्तर पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक था और आज भी है. ...वो अलग बात है कि आज की स्त्री, पुरुष के साथ होड़ कर रही है, ..रेस जारी है जोरों से, ...पर उसे यह भान नहीं कि कुदरत ने तो उसे अधिक अच्छा व सक्षम बनाया है, उसका स्तर अपेक्षाकृत बेहतर है पुरुष से; ..फिर होड़ करके, पुरुष की बराबरी करने के क्रम में तो उसका स्तर गिरेगा ही!! ...और यही हो रहा है आज, ..और पुरुष-प्रधान भारतीय दुनिया हंस रही है, मजाक बना रही है, व्यंग लिख रही है- उस नारी के पराभव पर, जो उससे (पुरुष से) आगे थी कभी, पर आज नीचे जा रही है. मेरी हृदय से अपील है भारतीय स्त्रियों से कि-- "कुदरती रूप से आप बेहतर बनाई गई हैं, सोच में भी और शरीर से भी; मानसिकता भी बेहतर और शारीरिक सक्षमता भी विलक्षण; यही बुनियादी अंतर है आपमें और पुरुष में; इस पर गर्व करें और इसे ऊंचा समझें, क्योंकि वास्तव में यह इस लायक है; इसी कारण आप अधिक सम्मान के योग्य हैं और ऐसा सदा से होता भी आया है; आपके ऊंचे स्तर ने ही भारत के कई हिस्सों में सामाजिक संतुलन बनाकर रखा हुआ है, उदाहरणार्थ- बिहार (जहां पुरुषवर्ग में नैतिकता का टोटा है); व्यर्थ की अंधी दौड़ और होड़ में अपने को नीचे न ले जायें; कुदरत ने आपको जो विलक्षणता दी है, उसे पहचाने, उसका सदुपयोग करें, ईश्वर के प्रति कृतज्ञ हों और स्वयं की मौलिकता, मौलिक गुणों पर बेहिचक बिंदास गर्व करें. स्त्री और पुरुष की अलग-अलग फंडामेंटल प्रॉपर्टीज़ हैं, बहुत सारी कॉमन हैं पर बहुत सी बिलकुल अलग भी, ..उन्हें परखें, जानें, आजमाएं ..और तब फर्क महसूस करें, ...आपको अपनी मौलिकता से एक दैवीय सुगंध महसूस होगी और अनावश्यक कृत्रिमता से आसुरी दुर्गन्ध. निश्चित रूप से यह बहुत अन्दर की बात है जिसको अनुभव नहीं वरन अनुभूत करना पड़ेगा."

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आदरणीय ठाकुर साहब, सादर अभिवादन! और क्या चाहते हैं बच्चे को यौन शिक्षा देने पर आमादा हो लेकिन उसे यौनकर्मी नहीं बनाओगे। नौवीं व ग्यारहवी के बच्चों को यौन शिक्षा देने पायलट प्रोजेक्ट बना चुके हो। बारह साल की उम्र में बच्चों के बीच सेक्स को वैध करार देने के लिये प्रस्ताव पर विचार कर रहे हो। बारह साल के बच्चों के बीच नान पैनेट्रटिव सेक्स यानी बाहरी अंगों के साथ सेक्स को अपराध मानने से इनकार के लिये मसौदे तैयार कर रहे हो। बेरा गर्क हो ऐसी सोच वालों का और मशविरा देनेवालों का!.... एक दिन भी ऐसा नहीं जाता जिस दिन दुष्कर्म की वारदात न हो फिर तो होगा खुल्लमखुल्ला जो बोयेंगे वही तो काटेंगे!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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क्यों तुम्ही बतलाओ इसमें बुरा क्या है। जो पढ़ोगे उसी फैकेल्टी की नौकरी मिलेगी ना। समाज में लोग शिक्षा मित्र की नौकरी पा ही रहे हैं। विकास मित्र बन ही रहे हैं तो यौन मित्र बनने में गुरेज कैसा। बच्चे को यौन शिक्षा देने पर आमादा हो लेकिन उसे यौनकर्मी नहीं बनाओगे। नौवीं व ग्यारहवी के बच्चों को यौन शिक्षा देने पायलट प्रोजेक्ट बना चुके हो। बारह साल की उम्र में बच्चों के बीच सेक्स को वैध करार देने के लिये प्रस्ताव पर विचार कर रहे हो। बारह साल के बच्चों के बीच नान पैनेट्रटिव सेक्स यानी बाहरी अंगों के साथ सेक्स को अपराध मानने से इनकार के लिये मसौदे तैयार कर रहे हो। बाल विकास मंत्रालय के पास प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल आफसेज बिल 2010 पड़ा है लेकिन तुम तो बच्चों को रूपम पाठक बनाना चाहते हो जो एक दिन खुद खंजर उठाकर तेरे सिने पर खड़ा हो जाये। परोसो, खूब परोसो। नग्नता को उछालो। मगर सोच लेना पहले और बाद का सेंस आफ सेक्स। बच्चे तुम्हारे हैं। सेक्स की पढ़ाई तुम्हारी जरूरत ही है। इसके बिना तुम शिक्षित नहीं कहला सकते तो एक सलाह बिन मांगें दे रहा हूं- शहर वालों मान लेना गांव मेरा आ गया-बच्चियों के सर पे जब आंचल नजर आने लगे। आपने आखिर की पंक्ति में कितनी गज़ब की बात कह दी , निचोड़ लिख दिया ! सही कहा आपने , कुछ तो लिहाज़ रहने दो !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

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के द्वारा: Prashant Singh Prashant Singh

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आदरणीय ठाकुर साहब, नमस्कार! मुझे लगता है इतना सबकुछ लिखने के बाद जरूर बत्ती (बिजली) चली गयी होगी ... नहीं तो लिस्ट और लम्बी हो सकती थी. ...या मुझे लगता है १० करोड़ में इतना बहुत है!.... अब तो यह भी लगने लगा है की कही इस ब्लॉग पर कही राज ठाकरे की अनुयायियों की नजर न पड़ जाय. नहीं तो वह फिर इसको सबूत के तौर पर पेश कर देगा!..... हम बिहारी हैं ही इसी लायक.... जंगल राज में भी इतना सब कुछ नहीं होता होगा! नितीश बाबु अब दिल्ली जायेंगे. टिकट कटाकर सबको ले जायेंगे रामलीला करने के लिए और सीता हरण दिखलायेंगे! हाय रावण! .. तुम्हे भी सीता की ही भूमि मिली थी पुनर्जन्म के लिए! कैसे कैसे नज़ारे दिखाए हैं आपने! .. यह भी विरोधियों की चाल होगी ... जहरीली शराब से मरने वाले के बारे में यही बयान था नितीश बाबु का ... यह सब विरोधी पार्टी का षड्यंत्र है!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

हमारे देश के वैज्ञानिक 83 साल से नोबेल के पास भी नहीं फटक सके लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों बिकने में कहीं इन्हें शर्मिदगी, संकोच नहीं। लोगों पर इन कंपनियों की नई दवाओं का परीक्षण कर इस हिंदुत्ववादी देश को तबाह करने पर तुले,आमादा हैं। कहीं से इन्हें कोई गुरेज, शर्म नहीं। माना, नकलची हम शुरु से रहे हैं। यह हमारे स्वभाव, चरित्र में है। लेकिन सिर्फ शौक, जरूरतों के मुताबिक। सरेआम बलात्कारी को फांसी देने या पत्थर मार-मार कर उसे नपुंसक बनाने के लिए नहीं। इसके पीछे तर्क भी हिंदूवादी। यह सभ्यता मुस्लिम देशों की है। यह हमें नहीं सिखनी, पढऩी। बहुत गुस्से में लग रहे हैं ठाकुर साब ? काहे इतना पानी पी पीकर हिन्दुओं को कोस रहे हैं ? लेकिन आपने गलत थोड़े ही लिखा है ! सच ही तो लिखा है ! इस बात से भी सहमत हूँ की ज्यादातर मुस्लिम्स में बलात्कार की घटना नहीं होती ! हिन्दू पहले भी पिसा हुआ था आज भी है ! कुछ सोचता ही नहीं ! पहले बच्चे बना रहा था , अब बच्चे पाल रहा है ! सही गलत का उसे कभी ख्याल ही नहीं रहा ! हकीकत को आइना दिखता हुआ लेख !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आज जिसे देखे आंसू बहाते दिखाए दे रहा है लेकिन ये केवल वही लोग है जो टी.वी. में आना चाहता है या पेपर में तश्वीर खिचाना चाहता है | जबकि ज्यादातर लोगों को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं है और केवल १-२ प्रतिशत लोग ही है इस घटना के बारे में कुछ सुनना चाहते है | आज जिसे देखो पूरी दुनिया के सभी पुरूषों को दुष्कर्म के दोषी मान रहे है जैसे की सभी पुरूष दुष्कर्मी है | लेकिन क्या वह दिल्ली की महिलाए इस दुष्कर्म के लियॆ दोषी है नहीं जो उस लड़की को खून से लतपथ देखकर भी रुके नहीं या किसी अन्य लड़की को परेशानी में देखकर मुह मोड़ लेती है | सच तो यह है देश ज्यादातर पुरुषो को महिलाओं द्वारा प्रताड़ित किया जाता है और मानसिक एवं शारीरिक शोषण किया जाता है | यह खूब प्रचारित किया जा रहा है औरत के द्वारा ही सभी जन्म लेते है लेकिन यह नहीं कहते की उस जन्म में और उस इन्सान बड़ा करने में पुरुष का भी बड़ा योगदान होता है और यह योगदान स्त्री के योगदान से कतई कम नहीं होता है | समाज में सभी तरह के लोग होते है | कुछ पुरुष बुरे भी होते है और कुछ महिलाएं भी बुरी होती है | जिस तरह से महिलाओं ने अपने बारे दुखद माहौल बनाकर अपने पक्ष पुरुषों के खिलाफ क़ानून बनवा लिए है वह काबिलेतारीफ है और कमाल की बात यह है कि वे क़ानून परुषों के द्वारा ही बनाए गए है | अब इस तरह के सभी कानूनों का दुरुपयोग देखना हो तो सरकारी कार्यालयों में जाए जहां पर महिला कर्मचारी शायद ही कुछ हों जो अपने कार्य एवं दिए गए दायित्व का निर्वाह करती हो या समय पर कार्यालय में उनके दर्शन होते हों | ऊपर अधिकारी भी उंसे खौफ खाते क्योकि उन पर काम करने का दबाव डालते ही महिलाएं धमकी पर उतर आती है आप सभी जानते है की उसके आगे सभी मजबूर हो जाते है | ज्यादातर महिलाए मुफ्त में तनख्वाह लेती है | तो इस सब बात का दोषी कौन है भाई ? जाहिर है महिलाए ही दोषी है और वे अपने आप को दोयम दर्जे का साबित कर रही है | ऐसे बहुत से मामले है जहां महिलाओं ने पुरुषों को किसी अन्य कारण से सबक सिखाने के लिए अपने साथ दुष्कर्म करने का आरोप लगाकर सलाखों के अन्दर पहुचाया है | ऐसे अभी-अभी दो मामले प्रकाश में आये है, एक मामला राजस्थान का है (यह मामला दास्ताने जुर्म में ई-टी.वी. में दिखाया गया है) और दूसरा मामला मऊ (ऊ. प्र.) जिले का है | दोनों ही मामलों में लड़की ने गलत ढंग से ३-४ पुरूषों को जेल अन्दर पंहुचा दिया और बाद में जब जाच हुई और सच सामने आया तो सभी के होश उड़ गए | सैकड़ो ऐसे मामले होते रहते है लेकिन जानकारी में नहीं आते है | तो क्या ऐसे मामले में किसी लड़की के लिए उम्रकैद या उससे बड़ी सजा का प्रावधान नहीं होना चाहिए जो की कई पुरुषों की जिन्दगी तवाह कर रहा है ? लेकिन इसकी कोई पैरवी नहीं करता है और जो आवाज़ उठाता है उसे महिला विरोधी कहकर दबा दिया जाता है | आज ज्यादातर विवाहित पुरुष घरो में महिलाओं द्वारा गुलाम बनाए गए है और क्या इसके लिए महिलाए दोषी नहीं है | क्या इसके खिलाफ भी कोई क़ानून नहीं बनना चाहिए जो ऐसी महिलाओं को सजा दे जो पुरुषो का भयंकर मानसिक शोषण कर रही है | और मेरे विचार से महिलाओं द्वारा किया गया ऐसा शोषण ही पुरूषों बाहर की उग्र बनाता है और बलात्कार जैसे दुष्कर्म को बढ़ावा देता है | आज जो कोई भी महिलाओं के पहनावा को सुधारने के बारे में बात करता है उसकी आवाज को दबा दिया जाता है लेकिन यह बात सही नहीं है यदि महिलाओ को पुरुषो के पहनावे के बारे में कहने का हक़ है तो वही हक़ पुरुषो को भी होना चाहिए | आज यदि कोई महिला ऐसे कपड़े पहने जिससे उसके अन्तरंग दिखे तो उसे सराहा जाएगा और लेकिन यदि कोई पुरुष अपना अन्तरग दिखाए तो यही महिलाए शोर मचाकर उस पुरुष को बेशर्म कहेगी और जेल की हवा खिला देगी | ऐसा अंधापन और दोगलापन इस समाज में क्यों है और क्या यह न्यायोचित है और इसे बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है ? सच कहे तो कुछ बुद्धिमान पुरुष ही कुछ न कुछ जतन करके (जैसे फैशन शो, मूवी में कम कपड़े पहनाकर आदि) महिलाओं के कम कपड़े पहनने को बढ़ावा दे रहा है और तारीफ कर रहा है ताकि वह महिला के अन्तरंगो को खुलेआम सड़को पर देख सके और महिलाएं भी इस भ्रम को नहीं समझ पा रही हो और इसे फैशन के नाम वैसा ही कर रही है अपने स्त्रीवत्व को नष्ट कर रही है | आज लडकिया भी कम नहीं है वे भी कम कपड़े पहनना और आकर्षक मेकअप भी तो अपने किसी ख़ास पुरुष को आकर्षित करने लिए कर रही है लेकिन होता यह है सड़कों पर केवल उसका ख़ास साथी ही तो होता नहीं है बल्कि और भी पुरुष होते है और यही से गड़बडी शुरू हो जाती है | कुल मिलाकर मै यह कहना चाहता हूँ किसी का भी बलात्कार नहीं होना चाहिये जैसा महिलाओं का हो रहा है और न ही किसी का शोषण होना चाहिए जैसा पुरुषों का हो रहा है | मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है अत: समाज में जैसे रहना चाहिए वैसे ही रहे न की पशुओ की भाति जबकि आजकल स्त्री हो या पुरुष सब पशु जैसे बनाने का प्रयास करते रहते है और गड़बडी कर देते है | इसलिये ऐसे मामले को पूरे परिपेक्ष्य में देखना चाहिए, न की एक घटना की भयावहता से भयभीत हो उलटे – पुल्टे काम करने चाहिए |

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। मत भूलिए, संसद में सबसे पहले रोने वाली जनप्रतिनिधि जिस पार्टी की झंडा बुलंद करती/ओढ़ती/दिखती हैं उसी दल के सांसद उसी संसद में एक शीर्ष महिला के न सिर्फ हाथ झिड़के बल्कि सबके सामने कीमती कागज को तार-तार/फाड़ कर सबको शर्म में सान/मथ दिया। यहां उस बिल के समर्थन या विरोध की बात नहीं हो रही। सवाल, एक मोचन बलात्कार पर राजनीति का है। पहले हरियाणा अब दिल्ली। हर जगह उस लड़की की जिंदा लाश पर राजनीति। काफी लिखा आपने और सटीक लिखा ! कुछ मैं कहना चाहूँगा -जिस माननीय सांसद की आप बात कर रहे हैं उसी की पार्टी के तीन विधायक ऐसे हैं जिन पर बलात्कार का आरोप है और एक तो अपनी पत्नी को ही कहीं से उठाकर लाया था , अब वो भी लोकसभा जाने की तैयारी में है ! पहुँच गयी तो वहीँ बैठेगी , जहां कभी अटल बिहारी वाजपायी जैसे लोग विराजमान हुआ करते थे , उसी घर की शोभा बढ़ाएगी ! क्या बात है , संसद न हुई , क्लब हाउस हो गयी !

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मनोरंजन जी भाई सादर,सच है हरदिन ही शहर ही नहीं गाँवों में भी लडकियां महिलाएं लोगों कि बुरी नजर से प्रताडित हो रही हैं. यह शोर भी बस कुछ दिन का ही है. हो सकता है इन चार दुष्कर्मियों को जल्दी सजा भी हो जाए किन्तु जब तक शासन में हमारे द्वारा चुने हुए इनके भाई बैठे रहेंगे तो यह व्यवस्था को सुधरने देंगे क्या? अभी कल ही कि बात है जब कांग्रसी नेता निरुपम को स्मृति इरानी द्वारा उनका इतिहास याद दिलाया तो वह उसका मुह बंद करने के लिए पहले तो उसे राजनीति में जूनियर बताने लगे और जब वह खामोश नहीं हुई तो अभद्रता पर उतर आये और उसे नचनिया कहने लगे अंत में तो वे शटअप करते वे इससे कुछ अधिक ना बोलें इसलिए न्यूज चेनल ने वह कार्यक्रम ही रद्द कर दिया जब टीवी पर यह हो सकता है तो फिर इन लोगों के एकांत के चरित्र पर तो आसानी से समझा जा सकता है.

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आदरणीय मनोरंजन जी                                 सादर, यह सच है कि पत्रकारिता व्यापार बन गयी है. धन का लोभ किसी को नहीं बख्शता. इन सम्पादकों कि गिरफ्तारी के पीछे गहरी साजिश नजर आती है और मुझे इसमें अन्ना हजारे जी के आंदोलन के वक्त इस चेनल का जो रुख रहा था यह उसके बदले कि कार्यवाही हि मुझे प्रतीत होती है क्योंकि जिस डीलिंग कि बात हो रही है वह एक सम्पादक ही नहीं वरन एक बिजनेस एक्सक्यूटीव भी है. यदि यह नजरिया रखा जाए तो कोई गलत लेनदेन नजर नहीं आएगा. यह कंपनी मालिक कि लापरवाही या चालबाजी है. एनबीए का इस वक्त रुख बहुत हि स्वार्थ पूर्ण लगा. जिसको अपने सदस्यों से सही जानकारी ले कर उनकी मदत करनी चाहिए उसने बिना देर किये उनकी सदस्यता ही समाप्त कर दी. इसलिए मुझे तो यह पिक्चर अभी क्लियर नही दिख रही है. 

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ऐसे में बिलावल का हिना के साथ यू ट्यूब में धीरे-धीरे डाउनलोड होना पूरे पाकिस्तान को नागवार है। आखिर, पाक की लौ हैं बिलावल। वहां की आवाम उनसे, नया खून से, नव रचना, मंजिल, हौंसला, नई सोच व नैतिक मूल्यों की आस में है। देशहित में समर्पित होने को वहां के असंख्य हाथ उठ गए हैं। वैसे, पाकिस्तानी इश्क का जबाव अपुन हिंदुस्तानी ने रेप यानी बलात्कार से दे दिया है। खबर आयी है छनकर दिल्ली उसके बाद इलाहाबाद से। कुंवारी कन्याओं के चहेते, भावी प्रधानमंत्री, कांग्रेस के महासचिव, सांसद, युवाओं के ऑइकन, हीरो, अपने अमूल बेबी अब बड़े हो गए हैं। उनमें मर्दानगी आ गई है। सो, उन्होंने इश्क करने की बजाए सीधा दुष्कर्म ही कर डाला। बलात्कारी बन बैठे अपने राहुल गांधी। पहले लड़की को बंधक बनाया फिर मर्दानगी उतार दी…। वैसे, सीबीआइ जांच, तह तक पहुंच रही है। मामले की तहकीकात भी हो रही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में लोग बहस भी कर रहे हैं। सीधा ले चलते हैं कोर्ट, दिखाएंगे… कैसे कांग्रेस महासचिव पर लगाए गए इल्जाम बेबुनियाद साबित होंगे… सीबीआइ कैसे क्लीन चिट देती है… राहुल बाबा कोर्ट से क्या कह रहे हैं…बंधक बनाने व रेप में वे शामिल थे या नहीं…ये विदेशी साजिश है या कुछ और… सब दिखाएंगे, लाइव…इस्लामाबाद, दिल्ली, इलाहाबाद भी ले चलेंगे, बस बने रहिए हमारे साथ…मगर सबकुछ एक ब्रेक के बाद…। ब्रेक से जरा जल्दी लौटना मनोरंजन जी ! आपके मस्त लेखन का इंतज़ार रहता है ! इस लेख में आपने सब कुछ कह दिया ! मैं कुछ नहीं कहूँगा !

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सर जी,सादर प्रणाम उत्कृष्ट लेख ! बहुत अच्छा व्यंग्य | पत्नी को वेतन देना संभव ही कहाँ है? पत्नी का दरजा एक संपूर्ण व्यवस्थापिका का होता है । उसका वेतन निर्धारण असंभव है । यदि वह गृहिणी है , तो उसकी आर्थिक स्थिति को सुरक्षित रखने के लिए पति की तन्ख्वाह में से एक निश्चित अंश पत्नी के बैंक अकाउंट में देना सुनिश्चित किया जा सकता है। पर यह उपाय भी निम्न मध्यम वर्ग के लिए अव्यावहारिक होगा। यदि पत्नी नौकरीपेशा है , तो वह घर की जिम्मेदारियों में बराबरी की माँग कर सकती है । फिर भी यह देखना दिलचस्प होगा कि २४ घंटों में से १८ घंटे पूर्ण निष्ठा से अपने पति और परिवार की सेवा करने वाली पत्नी का वेतन कितना निर्धारित होता है? एक अच्छे एवम सुसँस्कृत परिवार मे तो पहली तारीख को ही पूरी तनखाह ही पत्नी के हाथ मे दे दी जाती है, बाद मे यह उसकी जिम्मेदारी रहती है कि पूरे महीने घर सुचारु रूप से चले, इसमे न्यायालय ने कौन सी नई बात कह दी

के द्वारा: अजय यादव अजय यादव

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पहली बात हम दिव्य (दिव्या ) नहीं है , हम तो छोटी सी दीप्त(दीप्ति) है ! दूसरी बात हमने ये तो नहीं कहा कि आप स्त्री विरोधी है ! आपने बिपाशा के खुले शरीर के समर्पण की बात तो लिख डाली पर नायक की लालसा का क्या ? क्या इसके लिए एक पक्ष ही जिम्मेदार है ? वैसे आज के सामाजिक हालत वास्तव में बहुत ख़राब हो चले है कुछ मीडिया का योगदान भी है इसमें ,,कुछ प्रशासन की लापरवाही !अभी हाल ही में दिल्ली में जब असामाजिक तत्वों ने एक लड़की की अस्मत पर हाथ डाला ,तो उस लड़की का सवाल था कि दिल्ली में क्या कोठे ख़तम हो गए है ?राजधानी में जहा सारा प्रशासन है वहां ये सवाल कितनी शर्मिंदगी भरा है ? प्रशासन अपनी मौज में है जनता बेबस ! और सही में जनता बेबस कम सवेंदनहीन ज्यादा है (गुवाहटी केस ) आपका नाम मनोरंजन किसने रखा ?बुरा मत मानियेगा ये मजाक है ....आभार

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मनोरंजन जी नमस्कार .आपके नाम की तरह आपके ब्लाग के शीर्षक भी मनोरंजक है ! तसलीमा के लेख यदा कदा हमने भी पड़े है हमेशा ही यही लगा कि इनकी लेखनी प्रभावी है !हो सकता है वो जो निर्वासित जिन्दगी जी रही है उनके लेख उसी का परिणाम हो .!इंतनी गहरे से इनके बारे में जानकारी नहीं थी जो आपने लिखी है ! वैसे सही लिखा आपने लोग खुद को बचाने के लिए दुसरे पर हावी होने की कोशिश करते है ( जिसे महिलाएं हमेशा नस्तर, औजार के रुप में बेजा इस्तेमाल करना नहीं चूकती)ये बात केवल महिलाओ पर ही नहीं हर गलत मानसिकता वाले इंसान पर लागु होती है !वैसे आज बहुत महिला चरित्र है ,जो पूरी स्त्री जाति के स्त्रीत्व पर प्रश्न चिन्ह लगाने पर मजबूर कर देते है ! आपकी लेखनी लाजवाब है !बधाई

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बच्चों, किशोरों की पीढ़ी को विकृत यौन कुंठा में ओठनें के बाद यह तबका अब उन्हें बिछावन बनाने की तैयारी में है। इनमें अधिकांश संभ्रात परिवार की महिलाएं जो बेशुमार दौलत, पैसे की चाहत, शौक या फिर पति के परदेश में होने का पूरा मजा उठा रहीं हैं या फिर वहां की हॉस्टलों में रह रहीं छरहरी काया। सब पासवर्ड की तरह इस्तेमाल होने को बेचैन है। मनोरजन भाई बड़ी चिंता का विषय है न जाने क्या होगा ये भौतिक सुखों के पीछे अतिरंजित हो दौड़ने की चाह यूरोप से भी आगे जा रही है अब वे लोग इधर का रुख कर रहे हैं सस्ता है आसान है कानून का लचीला पन धज्जियां उड़ा रहा है ..सार्थक लेख ...काश लोग इसके परिणाम भी देखें तवाही भी देखें सुधरें भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5