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अंखियां करे जी हुजूरी

Posted On: 11 Aug, 2014 Others में

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देशवाद का गुस्सैल चेहरा. जलती मोमबतियों की फकफकाती लौ. रेंगते असंख्य लोग. सिसकती चेहरों से टपकते बूंदों के सैलाब.निर्भया की मौत याद तो होगा ही. वही पारा मेडिकल की लडकी निर्भया आज भोगवाद की दुनिया का हिस्सा, नग्न बाजार में बेच, परोस दी गयी है. दृश्य, हालात, माहौल, परिवेवश, रात की सनसनाहट भी बिल्कुल, हुबहू वही. तंग कपडों की झिझरी से झांकती महिलावादी एक माॅडल चारों तरफ से नक्कासीदार, संजे-संवरे पुरूषों की ईमान खरीदती, बांहों में गलबाहियां, अठखेलियां करती, झुलती नग्न आवरण में खुद को संभालती, शर्माती, सकुचाती, लजाती उसी में लिपटी बस में सफर करती आज उस बाजारवाद में कदम उतार चुकी है जहां ग्लैमर में बहकने, देह की सिलवट में गुथने की तमाम लसलसाहट, बंदिशें आम व खास के हिस्से में शुमार है. ठीक उसी दहलीज पर मादकता लिए मिलती खडी है एक आम औरत. जो धधकती भी है. खुद सुलगती भी. छलनी,लहुलूहान, शोषित, प्रताडित भी होती, दिखती है और खुद अंखियों में पुरूषों से जी हुजूरी करवाती देह की पैमाइश में मोचन की मंजूरी भी देती, चमडी चरित्र को जीती उसे ही निहारती, चिंतन करती सबको न्योता देती. आखिर, नखरे हजार, लाजबाव हुस्न की एंजिल कभी ना हार मानने वाली एक औरत को भी एक किक चाहिए जो डेविल यानी पितृसत्तात्मक समाज के एक मर्द के सिवा दूसरा कोई दे, सुला नहीं सकता. बची बात, दुष्कर्म व कर्म की. बलात या स्वेच्छा, रजामंदी, मर्यादा की. इसी कशमकश में अब तक की सरकारें भी फंसती, निकलती दिखी है. कहां जुवनाइल को वयस्क बनाने, मानने की मशक्कत,वकालत. वहीं निर्भया के दरिंदों की फांसी से रोक हटाते पंच. जिनकी विश्वसनीयता पर एतबार, यकीन, भरोसा टूटता दिल्ली में दोबारा चुनाव कराने से लेकर सरकार से दलील, सवाल पूछने या फिर खुद जज के यौन कुंठा में लिप्त रहने की दलील सुनने में ज्यादा बीत रहा.लिहाजा, आज महिलाएं मन तंत्र से देह तंत्र तक उतरने, विरोध व आदर के बीच फंसती, निकलती द्वंद्व में है. ऐन वक्त पर धर्म के रसुकवालों ने उनकी दिशा बदलने की हद में है. मेरठ के खरखौदा में एक औरत मर्दों की जिस्मानी भूख मिटाती, तडपती, लथपथ हालात पर रोती मिलती है बल्कि वजूद, एक समग्र स्त्री होने के धर्म को भी पीछे धकेलती धर्म परिवर्तन की जिद का विरोध उसी जख्म से रू-ब-रू उसी पंच के सामने गिडगिडाने, मन्नत मांगती दिखती है जिसकी नजर में समलैगिंक भी जायज की पंगत में खडा है.

ओंकार मूलमन्त्राढृयः पुनर्जन्मदृढाशयः
गोभक्तोे भारतगुरूर्हिंंदुर्हिंसंनदूषकः

इसी मूलमंत्र के ईदगिर्द आज स्त्रीत्व का संपूर्ण चरित्र भी शर्मनाक मोड पर है. जहां ओंकार, पुनर्जन्म, गाय की भक्ति हिंसा को निंदनीय मानने वालों की फेहरिस्त को टटोलती सानिया मिर्जा एक प्रश्न, बूत बनकर सामने है. सानिया ही क्यों? शाहरूख, सलमान खान भी उसी हताश, नाजुक हालात पर खडे मिलते हैं जहां आज महज बुर्का वाली होने की खातिर सानिया रोती, बिलखती, आपबीती सुनाती सार्वजनिक हिस्से से बाहर है. आखिर, कब तलक मुसलमान होने की गुनाह, कीमत ढोता रहे इस मुल्क में जन्म लेने वाला शख्स. पैदा लेने से पहले पूछा जाता तो शुद्र भी हिंदू होने के तमाम रास्ते, उसकी जरूरत, अर्हता, वर्तनी, अलंकार को स्वीकार कर ही जन्मते. मगर ऐसा नहीं है. देश आज हिंदुत्व की राह पर सरफरोशी करने को बेचैन है.अमिर खान के पीके में कपडे उताने पर बवेला मचता है वहीं नरोडा दंगों की दोषी गुजरात की पूर्व मंत्री माया कोडवानी जेल से छूटती, जमानत पर रिहा होती मिलती है. मुज्जफरपुर के बाद सहारनपुर में हिंदू-मुसलमान होने के फर्क सार्वजनिक महसूसेे जा रहे. गोवा के मंत्री सुदीन धवलीकर को सार्वजनिक जीवन में बिकनी, मिनी स्कर्ट और पब पहुंचती बोडका पीती, खुले बदन वाले गैर मर्दों से इश्क, प्यार, वार करवाती, हर इंतजाम को टटोलती, नेक इरादों में छुपे गंदे कामों को देखती उसे निहारती महिलाएं खूबसूरत लगती हैं मगर समुद्री तटों पर इसकी रंगीनियत उन्हें नापंसद. हालात यही, कोलकाता में तस्लीमा नसरीन के रेजिडेंट वीजा को लेकर साहित्यकारों के बेजा मौन, सडक पर नहीं उतरने का फैसला उतना ही आश्चर्यजनक, खतरनाक जितना मिजोरम की राज्यपाल कमला बेनीवाल की बर्खास्तगी को लेकर विपक्ष की राॅर. हालात देखिए, ये देश की वही सीबीआई है जिसे बदायूं में दो नाबालिगों के साथ दुष्कर्म व हत्या में उत्तर प्रदेश की पुलिस की भूमिका पर शक, संदेह के साथ एफआइआर तक नकली, फर्जी दिख रहे. याद कीजिए. गाजियाबाद में आरूषि-हेमराज हत्याकांड. नोएडा पुलिस के अनुसंधान. माता-पिता को सीबीआइ ने झूठ व गैरइरादतन फंसाने की बात कह दोबारा जांच की और अंत, तलवार दंपती की जेल. यह देश वही है यहां महिलाओं के दोहरे चरित्र, स्त्री के प्रति विरोधाभासी छवि विकृत, बर्बर, विकराल मानसिकता के सामने खुद स्त्री होने का मतलब तलाशती एक औरत. नरेंद्र मोदी को खुश करने एक नन्ही जलपरी श्रदृधा गंगा की मौजों से लडती निकलती जल यात्रा के बीच उषा विश्वकर्मा का रेड बिग्रेड ग्रुप. महिलाओं को आत्मरक्षार्थ गुर सिखाती. सवाल यही, महिलाएं कब तलक भोगवादी धर्म की तस्वीर में रंग भरती, जी हुजूरी करवाती रहेगी. आखिर कभी तो जागेगी..

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
August 14, 2014

आपका लेख सोचने को मजबूर करता है । अच्छा लिखा है आपने ।

pkdubey के द्वारा
August 13, 2014

avshy hee naree ke badalne se hee samaj badlegaa aadarneey.sadar badhai.


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