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कर दो वतन के वास्ते कुरबान जिंदगी

Posted On: 25 Aug, 2014 Others में

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देश-पाक में जिच। दूर होती दूरी। यथावत माहौल। सीमाओं पर उसी आकार में दमकते, दहकते गोले। थकान से भरी, थकते सैनिकों के चेहरे। खून से सनी, गीली, भींगा बदन। सीने में सुलगते अरमां। वतन उस सरहद की हिफाजत की कसमें। कोई नाजुक हाथ भी छू ले तो नस्तर चल जाए। वहीं, मरते, चिंताओं पर लगते मेले की पुरानी होती बातें। सियाचीन में गया प्रसाद की आपरेशन मेघदूत में मौत व अठारह साल बाद पहुंचता परिजनों के पास शव। हैरान परिजनों को सहारा, उसकी रखवाली तो दूर शव को एक पुष्प तक अर्पित करने की चाहत से बेखबर बिना गांधी टोपी के लालकिले से गरजने वाले ने अच्छे दिन की शुरूआत में ही नवाज को न्यौता क्या दिया मामला वहीं जाकर फंस, रूका है। वैसे, सरकार के नजरिए के प्रति लोगों की सोच ग्लो करने की एक खूबसूरत वजह है। वह है, मोदी के आक्रमण के अंदाज पर भरोसे का। मगर, दिल टूट सा गया है। बंदूक के गरजने का रंग उसी पुराने मिजाज में है। कश्मीर मसले पर तीसरे पक्ष की जरूरत महसूस नहीं हो रही। शिमला समझौता व लाहौर घोषणा पत्र से आगे निकलने की चाहत और पाक की बेवफाई भारतीय एतराज को दरकिनार, कोने में रोकती, अलगाववादियों के गले में बांहें डालने को बेताब है। 25 अगस्त को सचिव स्तर की वार्ता का टूटना देश के जनमानस के लिए कोई नयी बात नहीं। लाहौर ने स्वतंत्रता दिवस पर झंडा क्या लहराया, राष्टगान की जगह उसी राग को सरेआम कर दिया जहां आज भी कश्मीरी हिंदू उसी पाकिस्तान के रहमों करम पर जिंदा, सांसें ले रहे हैं। हिमाकत तो यह, दिल्ली में पाक उच्चायुक्त कश्मीर के अलगाववादी हुर्रियत नेताओं सैयद अली शाह गिलानी, उमर फारूकी, यासीन मलिक की मेहमाननवाजी में यकी पैदा कर रहा। भला, इससे अच्छे दिन आतंक की बीज बोने, तालिबान को भडकाने, आइएस को शह व दाउद को आदर, शरण देने वालों के लिए और क्या होंगे? मगर, हम मुगालते में हैं। सेना ने चीनी घुसपैठ का माकूल जवाब दिया यही सोच आज भी हमारे पाले में हैं। काश! सोचा होता, लदाख के बुत्र्से और पेगांग त्सो झील में चीनी सेना रंगरैलियां मनाने नहीं आयी। शाहजांहपुर की उस मां सरीखे,जो पहले अपनी गर्भवती बेटी के आशिक को उसी की मदद से फंदे में कसती है। बाद, प्रेमी शिक्षक की मौत पर अपने ही हाथों बेटी की जान लेती आत्महत्या की शक्ल देती मिलती, दिखती है।
हालात यही, दीमक की चट फाइलांे से फिर कश्मीरी हिंदू विलाप सामने है। हवस की शिकार औरतें। वेबा, माथे पर सिंदूर के नामो निशान मिटाए, लिए। चूडियों की खनक से दूर। रोते-बिलखते बच्चों के क्रंदन। लाचार बाप के कंधे पर जवान बेटे की अर्थी। मस्जिद से अजान के बदले जान से खेलने की हुक्म सुनाते पाकिस्तानी कटृटमुल्ले, ताकतों के सामने लाचार, बेबस, जिंदगी को जीते, आसमां को घर मान लेने,जमीं को शमशान समझने, गोलियों की सनसनाहट किसी पटकथा का हिस्सा नहीं उस दर्द, सिहरन,बेइतहां बेजुबां उस जहां की टीस है जिसके बारे में सोचने, समझने, विचारने के कोई शब्द किसी से पूछने, कहने की हिमाकत के बीच खुशी के दो पल कहां ढूंढे सरीखे, नौबत लिए कश्मीरी हिंदू होने का मतलब आज भी बयां, समझने, समझाने को बेचैन, विवश है।
याद है ना, अस्सी से नब्बे का वो दशक। उस दिन, तब से कश्मीरी हिंदुओं के हालात नहीं बदले। अपनों से दूर, मजहबी ताने-बाने में जकडी, उलझी उनकी जिंदगी आज भी उन्हीं आशियानों में कैद, खोजे, देखे जा सकते। जो, चंद प्लास्टिक के टुकडों से घिरी, कमजोर सहारों, रस्सी की डोर में बंधी, बांस की जिद पर टिकी कश्मीर की खूबसूरत वादियों में सुरक्षित लौट आने की राह, अपना वजूद खोजता, निहारता,टकटकी लगाए आज भी नाउम्मीदी में बैठा है। ऐसे में, कश्मीरी हिंदू ही नहीं तमाम वहां से विस्थापित आज कहां, किस हाल में हैं यह सबसे बडा सवाल है जिसे नरसिंह राव सरकार से लेकर अच्छे दिन की महज शुरूआत में ही यक्ष प्रश्न, आरएसएस के हिंदुस्तान में सभी हिंदू हैं के खोखले, अवसरवादी,नारे या हिंदू को धार्मिक विचारधारा नहीं सांस्कृतिक पहचान दिलाते केंद्रीय मंत्री वैकेया नायडू में सिमटा, सामने हैं। स्वतंत्रता के बाद से ही कश्मीरी हिंदुओं ने आजादी की महक सांसों में नहीं सहेजा। हां, राष्टीयता की बात करने वाले बलात, जर्बदस्ती घर से बाहर जरूर निकाल, फंेक दिए गए। यह सुनते,पाकिस्तान जिंदाबाद, निजामें मुस्तफा लागू करो। जालिमों, काफिरों, हिंदुस्तानी कुत्तों,कश्मीर खाली करो। हम चाहते हैं आजादी। काफिरों जान लो, इस्लाम तुम्हारी मौत है, इल्ला-इल्लहा…ये आज भले नारे सरीखे लगे मगर यह खौफ, तेजाब सरीखे था। 19 जनवरी 90 की भयावह रात याद तो होगी ना। जब, कश्मीरी मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर ऐसी शर्मनाक नारों ने स्तब्ध रात को भी जगा, छटपटा दिया। हिंदुओं को लगा, तय है, सुबह की लाली के साथ यमराज सामने होंगे। ऐसे माहौल में कोई हिंदू युवक माथे पर लाल सिंदूर, तिलक लगा निकल जाए तो सलूक वही जो इस्लामी मुल्कों में काफिरों का होता है। बेकाबू हालात इतने पर मानने को कहां था तैयार? औरतों की इज्जत के नारे यहां पाकिस्तान बनाना है पंडितों के बगैर पंडिताइनों के समेत ने गैरतमंद मर्दों को विस्थापित होने का जहर पिला, थमा दिया। 19 फरवरी 1986 का भी दिन आया। अनंतनाग के मंदिरों को लूटा जाने लगा। मंदिरें नष्ट, जमींदोज होने लगीं। मूर्तियां पानी में स्वाहा। हिंदुओं के घरों को निशाना, लूटपाट, मौज स्थल बनाने की जिद में शरीर नोंचे जाने लगे।युवतियों को खतरे में महसूसने के बीच 1989 में पीपुल लीग के महासचिव शब्बीर अहमद शाह को हिरासत में लेने के बाद मानो ज्वालामुखी ने मुंह खोल दिया हो। सप्ताह में छह दिन कफर्यू और रोकने पर पाकिस्तानी तश्व सीविल की कफर्यू लगाने के फरमानों के बीच हिंदुओं पर जुल्म हदों से आगे बेरहमी को पार करता, रौंदता आगे बढा। सिलसिला आज भी कायम है। दिसंबर 89 से अब तक कश्मीरी विस्थापितों की जो जिंदगी रही या है वह शर्म को भी शर्मनाक करने से ज्यादा। तत्कालीन नरसिंह राव सरकार से लेकर टीआरएस की सांसद के. कविता की बयां हकीकत कि कश्मीरी हिंदुओं की जिंदगी गाजा व फिलस्तीन सरीखे है बिल्कुल वाजिब। साल दर साल, दशकों तलक जिस जख्म को कश्मीरी विस्थापितों उनकी औरतों, बच्चों, युवाओं की देह ने महसूसा, भोगा है वह मोदी के सिपहसलार गृहमंत्री राजनाथ सिंह के उस संक्षिप्त बयान कि उनकी घर वापसी होगी से कहीं भी घावों को ताकत, मरहम लगाने तक के योग्य नहीं। सियाचीन में माइनस 70 डिग्री सेल्सियस जहां सांस लेने के लिए ना तो आक्सीजन ना नहाने को पानी। बर्फ को पिघला, दवा डालकर पीने को विवश तीन महीने की सजा काटते 1986 से सैनिक आपरेशन मेघदूत के सहारे सरहद को महफूज रख रहे बावजूद उन्हें जिंदा लौटने पर मिलता क्या है? वही लकवाग्रस्त, फेफडों में पानी सरीखे बीमारियों से भरी जिंदगी जिसके बाद उस तल्ख हवाओं के छेद से छलनी बदन को सहारा देना भी मुश्किल। ऐसे में, तीस सालों से भारतीय सेना मौसम से भी जबर्दस्त टक्कर दुश्मनों को देते हुए आज सरहद को हिफाजत की लिहाफ में लिपटाए पाकिस्तान के नापाक इरादों को पिघला, वापस लौटने पर विवश कर रही यह किस इंसानियत, मजहब का हिस्सा है यह समझ से परे। ऐन मौके पर सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले इंडोनेशिया की चिंता वाजिब शक्ल में है। राष्टपति सुसीलो बम्बंग युधोयोनो के विश्व को आगाह ने जता दिया, इस्लामिक स्टेट आइएस के कामों से मुस्लिम धर्म को सिवा शर्मिदंगी के कुछ नहीं मिलने वाला।
ऐसे में, भले आज पाकिस्तान अपने अंदर ही गृहकलह की ओर बढता दिखे मगर अहसास वहां भी जगा है। इमरान खान भारत की लोकतंत्र की जयकार कर रहे हैं। ध्वस्त व जर्जर मंदिरों को दुरूस्त करने की मांग वहां भी उठी है। शायद, सीमा पर गोलीबारी, आतंकी घुसपैठ, लहुलूहान, छलनी जिस्म पर आध्यात्म आगे भारी पड जाए…
मैकश हर एक सांस का हो जाए हक अदा
कर दो वतन के वास्ते कुरबान जिंदगी।

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