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गांव की वो एक रात

Posted On: 14 Feb, 2015 Others में

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भयावह हो गई है
अब गांव की रात
टूटते, बिखरते बांस की जर्जर कायो के बीच
दौड़ती, सरसराती चली आती है सर्द हवा

झकझोड़ती, भिंगो देती है तन-बदन
धुंध का दुस्साहस
वो
घेर लेती है बलात
झोपडिय़ों को बिना आलंगन
बिन बताए/अकारण।

दूर पर कहीं भौंकता कुत्ता
गीदड़ों पर टूटता/लड़ता/पछाड़ता
कुत्तों की भौं-भौं…
या फिर
कहीं दूर मस्जिद से आती
अजान

बताती रात के सन्नाटे का वक्त
ठहरता/चलता समय।
वहीं कहीं आसपास से
झाल, ढ़ोलक की थाप पर सुनाई पड़ती
राम नाम…वो कीर्तन का रस…

आह…कितना मधुर
सब निस्तब्ध…/सब निस्तब्ध…।
गांव
बहुत सुहाना/ सजता है दिन में
थोड़ी सी भी बादलों, पेड़ों
को चीड़कर कहीं दूर से भी निकलेगी गर धूप
ओढ़ लेगी/ ढक सी लेगी
उसकी फीकी-फीकी सी गरमी
चटक आती है झोपडिय़ों में
रात भर बोरसी के लिए ढूढ़ता फिरता लकड़ी

वो आम के पेड़ों के छोटे-छोटे डंटल
वो लत्तियों से लपेटे, बंधे सूखे जारन के बंडल
नीचे फर्श को ओढ़े/वहीं पड़े सूखे पत्तों को टोकरियों में समेटे
घर लौटती महिलाएं/बच्चे

उसी बोरसी की आग
तन, मन से जुड़ा बैठा हूं…
बस
इंतजार है…
रात के लौटने का।
उसी आग को बिस्तर तक धकेल
उसे उकसाने की जिद लिए
दूर दिये को भी बुझा
काम पर लगा दिया है अभी-अभी।

अब
इसी शेष राख
वो लाल सूर्ख लकडिय़ों के चंद गरमाते टुकड़ों संग
देह को समेटे
कट जाएगी झोपड़ी में रात
जो बहुत भयावह…/धुंध से भरपूर…/बस सर्द है…
यही गांव है…।

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

OM DIKSHIT के द्वारा
February 19, 2015

बहुत ही सुन्दर एवं सजीव चित्रण,मनोरंजन जी.

deepak pande के द्वारा
February 18, 2015

sunder sajeev varnan sadar aabhaar आदरणीय मनोरंजन jee

pkdubey के द्वारा
February 17, 2015

ग्राम्य गिरा के बहुत से शब्द पढ़े ,बहुत अच्छा लगा आदरणीय ,सादर |

    manoranjanthakur के द्वारा
    February 17, 2015

    AAPKA TAHE DIL SE SUKRIYA PK BHAI

jlsingh के द्वारा
February 17, 2015

सब कुछ सामने चित्र सा उभरता है गांव की रात का सटीक वर्णन! आदरणीय ठाकर साहब, काफी दिनों बाद आप पधारे हैं…. सादर!

    manoranjanthakur के द्वारा
    February 17, 2015

    bahut bahut abhar shri jl bhai


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